अहमदाबाद. आजादी से पहले व आजादी के बाद कई वर्षो तक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वावलंबन के स्वप्न को साकार करने वाला चरखा अब जापानी लोगों के लिए सभी दुखों की कारगर दवा बन गया है। देश में भले ही चरखे को खास तवज्जो न दी जा रही हो, लेकिन जापान के लोग मन की शांति के लिए बापू के चरखे का उपयोग कर रहे हैं।यही कारण है कि पिछले तीन सालों में देश से सात सौ से अधिक चरखे जापान भेजे गए हैं। औद्योगिक रूप से विकसित जापान में लोग मन की शांति के लिए योग, प्राणायाम व किताबें पढ़ने के अलावा चरखा भी चलाते हैं। पिछले साल ही अहमदाबाद व जयपुर से 200 चरखे जापान भेजे गए थे। इस साल जयपुर से 100 और चरखे जापान भेजे जाएंगे।
गुजरात खादी ग्रामोद्योग मंडल के जरिए जयपुर के व्यापारी ओमप्रकाश श्रीमाली पिछले तीन सालों से जापान में पेटी चरखा भेज रहे हैं। उन्होंने बताया कि यह जापानियों के लिए मेडिटेशन व स्वस्थ जीवन का माध्यम बन गया है। गांधी आश्रम स्थित सरंजाम कार्यालय के चरखा प्रभारी कोदरभाई परमार ने बताया कि पेटी चरखा पर सूत कातने से मन काम में तल्लीन होता है।
चरखे का इतिहास : पुराने समय में शादी के वक्त महिलाओं के साथ दहेज में धन, पशु व अन्य वस्तुओं के साथ चरखा भी दिया जाता था। वे समूह में चरखा कात कर सूत व रेशम जुटाती थीं व एक-दूसरे से मेल-मिलाप कर लेती थीं। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान देश में पैदा हुए कपास को इंग्लैंड भेज दिया जाता था। वहां से कपड़ा तैयार कर देश में लाकर बेचा जाता था। गांधीजी ने इसके विरोध में लोगों को चरखे पर कपास कातने व स्वदेशी वस्त्र पहनने का आह्वान किया। यहीं से चरखा देश के स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया।
कौन इस्तेमाल करता है?
जापान में वरिष्ठ नागरिक मन की शांति के लिए पेटी चरखे उपयोग में लेते हैं। चरखे पर सूत कातने के लिए वे रुई की पूनी भी भारत से ही मंगवाते हैं। इससे एक-डेढ़ घंटे तक के लिए उन्हें मन का सुकून मिलता है





